सूफी गीत संगीत कभी किसी एक धर्म के दायरे में बंद नहीं रहे बल्कि हर धर्म ने उन्हें बराबरी से अपनाया। भारतीय उपमहाद्वीप में शायद ही कोई ऐसा शख्स होगा जिसने अमीर खुसरो का नाम ना सुना हो। गुजरे वक्त में गाड़ी पर बैठने वाले बादशाह भले ही बदल गए हो लेकिन में सूफी संतों की विरासत जो की त्यों न सिर्फ बरकरार रही बल्कि उनकी लोकप्रियता वक्त के साथ बढ़ती चली गई। कवि, शायर, गायक और संगीतकार अमीर खुसरो को भी उनके सूफी कमल के लिए याद किया जाता है। उन्होंने कई बेहतरीन कव्वालियां लिखी थी जो आज भी गई जाती है शायद ही किसी ने इस आपसी मेलजोल और ईश्वर तक पहुंचाने की इस खूबसूरत विद्या को खत्म करने की कोशिश की हो।
अमीर खुसरो की विरासत का जश्न मनाने के लिए 28 फरवरी को सुंदर नर्सरी में भव्य सूफी संगीत समारोह जहांन खुसरो का आयोजन किया। इस बार संगीत समारोह की रजत जयंती है। जहान ए खुसरो सूफी संगीत कविता और नृत्य को समर्पित एक अंतरराष्ट्रीय महोत्सव है। यह महोत्सव अमीर खुसरो की विरासत का जश्न मनाने के लिए दुनिया भर की कलाकारों को एक साथ लाता है। छाप तिलक सब छीनी रे, मोसे नैना मिलाइके। इस कव्वाली को अमीर खुसरो का सबसे मशहूर कलाम माना जाता है खास बात यह है कि यह कव्वाली बृज भाषा में लिखी गई है। इसका मतलब है कि ईश्वर ने मुझे मेरी जन्मजात पहचान और मेरे द्वारा हासिल की गई उपलब्धियां को अलग कर दिया इसका मतलब यह भी है कि अब मैं किसी धर्म या जाति का नहीं हो और ना ही कोई मेरा कोई सांसारिक होता है। इस कव्वाली के जरिए आमिर खुसरो ने अपने गुरु निजामुद्दीन औलिया के प्रति अपना समर्पण व्यक्त किया है। इसके जरिए उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी औलिया के दर पर गुजरने की ख्वाहिश जाहिर की है।






